1. विनिमय के माध्यम के रूप में मुद्रा (Money as a Medium of Exchange)
मुद्रा का अर्थ (Meaning of Money)
मुद्रा वह वस्तु है जिसे वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने के लिए भुगतान के साधन के रूप में सामान्यतः स्वीकार किया जाता है।
प्राचीन समय में लोग मुख्य रूप से वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) का उपयोग करते थे, जिसमें एक वस्तु का सीधे दूसरी वस्तु से आदान-प्रदान किया जाता था।
वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System)
वस्तु-विनिमय प्रणाली के अंतर्गत एक व्यक्ति अपनी वस्तु या सेवा के बदले किसी दूसरे व्यक्ति से दूसरी वस्तु या सेवा प्राप्त करता है।
उदाहरण:
एक किसान के पास गेहूँ है, लेकिन उसे जूते चाहिए। दूसरी ओर, एक मोची के पास जूते हैं, लेकिन उसे गेहूँ चाहिए। यदि दोनों गेहूँ और जूतों का आदान-प्रदान करने के लिए सहमत हो जाते हैं, तो यह लेन-देन संभव है।
आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या (Problem of Double Coincidence of Wants)
वस्तु-विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या आवश्यकताओं का दोहरा संयोग है।
इसका अर्थ है कि वस्तुओं का आदान-प्रदान तभी संभव होता है, जब दोनों व्यक्तियों को एक-दूसरे की वस्तुओं की आवश्यकता हो।
उदाहरण:
- किसान को जूते चाहिए।
- मोची को गेहूँ चाहिए।
- वस्तु-विनिमय तभी संभव होगा, जब मोची को उसी समय गेहूँ की आवश्यकता हो।
यदि मोची को गेहूँ की आवश्यकता नहीं है, तो दोनों के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान आसानी से नहीं हो सकता।
मुद्रा इस समस्या को कैसे हल करती है?
मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करती है।
किसान अपने गेहूँ को बेचकर मुद्रा प्राप्त कर सकता है और फिर उस मुद्रा से जूते खरीद सकता है।
इस प्रकार—
वस्तु → मुद्रा → वस्तु
वस्तुओं का सीधे आदान-प्रदान करने के बजाय लोग मुद्रा का उपयोग मध्यस्थ के रूप में करते हैं।
उदाहरण
मान लीजिए, रवि ₹500 की सब्जियाँ बेचता है। उसे ₹500 नकद प्राप्त होते हैं। अब वह इसी ₹500 से पुस्तकें, कपड़े या भोजन खरीद सकता है।
इसलिए मुद्रा वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-बिक्री को आसान और तेज बनाती है।
2. मुद्रा के आधुनिक रूप (Modern Forms of Money)
आज उपयोग की जाने वाली मुद्रा के रूप प्राचीन समय में मुद्रा के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं से अलग हैं।
आधुनिक मुद्रा के मुख्य रूप हैं—
- करेंसी अर्थात् कागजी नोट और सिक्के।
- बैंक जमा (Bank Deposits)।
करेंसी (Currency)
करेंसी में कागजी नोट और सिक्के शामिल होते हैं।
भारत में करेंसी नोट भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India — RBI) द्वारा जारी किए जाते हैं, जबकि सिक्के भारत सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं।
लोग करेंसी को विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार करते हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि दूसरे लोग भी इसे भुगतान के रूप में स्वीकार करेंगे।
लोग करेंसी क्यों स्वीकार करते हैं?
लोग करेंसी स्वीकार करते हैं, क्योंकि—
- इसे कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है।
- इसे व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।
- इसे अपने साथ ले जाना सुविधाजनक होता है।
- इसका उपयोग वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने में किया जा सकता है।
- लोग इसे भुगतान के एक मान्य साधन के रूप में स्वीकार करते हैं।
उदाहरण
यदि आप ₹1,000 का स्कूल बैग खरीदते हैं, तो दुकानदार ₹1,000 स्वीकार कर लेता है, क्योंकि वह जानता है कि वह इस धन का उपयोग दूसरी वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने के लिए कर सकता है।
3. करेंसी और बैंक जमा (Currency and Bank Deposits)
आज मुद्रा केवल हमारे हाथों में मौजूद नकदी तक सीमित नहीं है।
आधुनिक मुद्रा का एक बड़ा हिस्सा बैंकों में जमा धन के रूप में मौजूद होता है।
बैंक जमा (Bank Deposits)
लोग अपना पूरा धन घर पर रखने के बजाय बैंक खातों में जमा करते हैं।
बैंक खाते में जमा धन को सामान्यतः आवश्यकता पड़ने पर निकाला जा सकता है।
बैंक जमा को मुद्रा क्यों माना जाता है?
बैंक जमा का उपयोग भुगतान करने के लिए किया जा सकता है।
लोग बैंक में जमा धन का उपयोग निम्नलिखित तरीकों से कर सकते हैं—
- नकद धन निकालना।
- चेक जारी करना।
- डेबिट कार्ड का उपयोग करना।
- इलेक्ट्रॉनिक भुगतान करना।
- दूसरे बैंक खाते में धन हस्तांतरित करना।
इसलिए बैंक जमा मुद्रा का एक महत्त्वपूर्ण रूप है।
उदाहरण
मान लीजिए, नेहा के बैंक खाते में ₹20,000 जमा हैं। उसे पूरी राशि नकद निकालने की आवश्यकता नहीं है। वह डिजिटल बैंक हस्तांतरण के माध्यम से किसी दुकानदार को ₹5,000 का भुगतान कर सकती है।
इस प्रकार, नेहा का बैंक जमा मुद्रा के रूप में कार्य करता है।
4. मांग जमा और चेक (Demand Deposits and Cheques)
मांग जमा (Demand Deposits)
बैंक खाते में जमा वह धनराशि, जिसे खाताधारक की माँग पर निकाला जा सकता है, मांग जमा कहलाती है।
लोग आवश्यकता पड़ने पर इस धन का उपयोग कर सकते हैं।
मांग जमा का महत्त्व इसलिए है, क्योंकि इनका उपयोग सीधे भुगतान करने के लिए किया जा सकता है।
चेक (Cheque)
चेक बैंक को दिया गया एक लिखित निर्देश है, जिसके माध्यम से बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से एक निश्चित राशि दूसरे व्यक्ति या संस्था को भुगतान करने के लिए कहा जाता है।
चेक कैसे काम करता है?
मान लीजिए, अमन ₹8,000 की साइकिल खरीदता है।
₹8,000 नकद देने के बजाय वह दुकानदार को ₹8,000 का चेक दे सकता है।
दुकानदार चेक को अपने बैंक खाते में जमा करता है। इसके बाद बैंकिंग प्रक्रिया के माध्यम से आवश्यक राशि अमन के खाते से दुकानदार के खाते में हस्तांतरित की जाती है।
चेक के लाभ
चेक—
- बड़ी मात्रा में नकदी साथ ले जाने की आवश्यकता कम करते हैं।
- भुगतान का सुविधाजनक माध्यम प्रदान करते हैं।
- अलग-अलग बैंक खातों के बीच भुगतान संभव बनाते हैं।
- लेन-देन को आसान बनाते हैं।
उदाहरण
एक विद्यार्थी अपने माता-पिता के बैंक खाते से ऑनलाइन बैंक हस्तांतरण के माध्यम से स्कूल की फीस जमा करता है। इसमें भौतिक नकदी का आदान-प्रदान नहीं होता, फिर भी भुगतान पूरा हो जाता है।
5. बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ (Loan Activities of Banks)
बैंक मुख्य रूप से दो कार्य करते हैं—
- लोगों से जमा स्वीकार करना।
- लोगों को ऋण देना।
लोग अपनी बचत बैंकों में जमा करते हैं। बैंक इन जमाओं के एक बड़े हिस्से का उपयोग व्यक्तियों और व्यवसायों को ऋण देने के लिए करते हैं।
बैंक जमा धन का उपयोग कैसे करते हैं?
मान लीजिए, किसी बैंक को विभिन्न ग्राहकों से कुल ₹10 लाख की जमा राशि प्राप्त होती है।
बैंक निकासी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक छोटा हिस्सा नकद या आरक्षित निधि के रूप में रखता है और शेष उपलब्ध धनराशि का उपयोग ऋण देने के लिए करता है। वास्तविक आरक्षित आवश्यकताएँ और उपलब्ध ऋण राशि लागू नियमों तथा बैंक की परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं।
ऋण लेने वाले लोग इस धन का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए करते हैं।
बैंक ऋण का उपयोग
ऋण का उपयोग निम्नलिखित कार्यों के लिए किया जा सकता है—
- नया व्यवसाय शुरू करना।
- मशीनें खरीदना।
- कृषि कार्य करना।
- शिक्षा प्राप्त करना।
- मकान खरीदना या बनवाना।
- वाहन खरीदना।
- अन्य वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करना।
बैंक आय कैसे अर्जित करते हैं?
बैंक ऋण पर ब्याज लेते हैं।
ऋण लेने वालों से प्राप्त ब्याज बैंकों की आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
उदाहरण
एक बैंक किसी व्यवसायी को ₹5 लाख का ऋण निर्धारित ब्याज दर पर देता है। व्यवसायी इस धन से मशीनें खरीदता है और समय के साथ ऋण की राशि ब्याज सहित चुकाता है।
6. साख और उसका महत्त्व (Credit and Its Importance)
साख का अर्थ (Meaning of Credit)
साख ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसी व्यक्ति को वर्तमान में धन, वस्तुएँ या सेवाएँ प्राप्त होती हैं और वह भविष्य में निर्धारित शर्तों के अनुसार उस राशि को चुकाने का वादा करता है। सामान्यतः इस पर ब्याज भी देना पड़ सकता है।
साख क्यों महत्त्वपूर्ण है?
साख लोगों की निम्नलिखित कार्यों में सहायता कर सकती है—
- व्यवसाय शुरू करना।
- उपकरण खरीदना।
- कृषि में निवेश करना।
- शिक्षा पर खर्च करना।
- मकान खरीदना।
- अस्थायी वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना।
साख के सकारात्मक प्रभाव
जब साख का उपयोग उत्पादक कार्यों के लिए किया जाता है, तो यह उत्पादन और आय में वृद्धि कर सकती है।
उदाहरण
एक किसान बीज, उर्वरक और सिंचाई उपकरण खरीदने के लिए ₹50,000 का ऋण लेता है। किसान अधिक फसल पैदा करता है और इतनी आय अर्जित करता है कि ऋण चुका सके।
इस स्थिति में साख उत्पादन और आय बढ़ाने में सहायता करती है।
साख से समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं
साख हमेशा लाभदायक नहीं होती।
यदि ऋण लेने वाला व्यक्ति ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाता है, तो उसे वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति ऋण-जाल (Debt Trap) का रूप ले सकती है।
उदाहरण
एक किसान खेती के लिए ऋण लेता है। फसल खराब होने के कारण उसकी आय बहुत कम रह जाती है। यदि वह ऋण नहीं चुका पाता, तो उसका बकाया ऋण बढ़ सकता है और उसे अपनी पुरानी देनदारी चुकाने के लिए नया ऋण लेना पड़ सकता है।
इसलिए साख लाभदायक भी हो सकती है और जोखिमपूर्ण भी। इसका परिणाम ऋण की शर्तों तथा ऋण लेने वाले की पुनर्भुगतान क्षमता पर निर्भर करता है।
7. साख की शर्तें (Terms of Credit)
जिन शर्तों के आधार पर ऋणदाता किसी व्यक्ति को ऋण देता है, उन्हें साख की शर्तें कहा जाता है।
इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें शामिल होती हैं।
1. ब्याज दर (Interest Rate)
ब्याज दर वह दर है, जिसके आधार पर ऋणदाता द्वारा दिए गए ऋण पर ब्याज लिया जाता है।
उदाहरण:
यदि कोई व्यक्ति 10% वार्षिक ब्याज दर पर ₹10,000 का ऋण लेता है, तो एक वर्ष का ब्याज ₹1,000 होगा, बशर्ते समझौते में साधारण ब्याज और एक वर्ष की पूरी अवधि के लिए यही शर्त लागू हो।
2. जमानत (Collateral)
जमानत वह संपत्ति है, जिसे ऋण लेने वाला व्यक्ति ऋण के बदले सुरक्षा के रूप में प्रस्तुत करता है।
जमानत में निम्नलिखित संपत्तियाँ शामिल हो सकती हैं—
- भूमि।
- मकान।
- वाहन।
- पशुधन।
- बैंक जमा या अन्य स्वीकार्य संपत्तियाँ।
यदि ऋण लेने वाला व्यक्ति समझौते के अनुसार ऋण चुकाने में असफल रहता है, तो ऋणदाता को ऋण अनुबंध और लागू कानून के अनुसार जमानत पर अधिकार प्राप्त हो सकते हैं।
3. दस्तावेजीकरण (Documentation)
बैंक ऋण देने से पहले निम्नलिखित दस्तावेज माँग सकते हैं—
- पहचान प्रमाण।
- पते का प्रमाण।
- आय से संबंधित दस्तावेज।
- आवश्यकता के अनुसार संपत्ति के दस्तावेज।
4. पुनर्भुगतान का तरीका (Mode of Repayment)
ऋण लेने वाला और ऋण देने वाला इस बात पर सहमत होते हैं कि ऋण किस प्रकार चुकाया जाएगा।
भुगतान निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है—
- किस्तों में।
- मासिक भुगतान के रूप में।
- एकमुश्त राशि के रूप में।
- किसी अन्य सहमत तरीके से।
5. ऋण की अवधि (Duration of Loan)
ऋण समझौते में यह भी निर्धारित होता है कि ऋण कितने समय में चुकाना होगा।
उदाहरण
दो व्यक्तियों को ₹1 लाख के ऋण की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उन्हें अलग-अलग शर्तों पर ऋण मिल सकता है। इसका कारण उनकी आय, जमानत, ऋण चुकाने की क्षमता और ऋण लेने का उद्देश्य हो सकता है।
इस प्रकार, अलग-अलग ऋण लेने वालों के लिए साख की शर्तें अलग हो सकती हैं।
8. साख के औपचारिक स्रोत (Formal Sources of Credit)
साख के औपचारिक स्रोत वे संस्थाएँ हैं, जो मान्यता प्राप्त नियामक व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करती हैं।
साख के प्रमुख औपचारिक स्रोत हैं—
- वाणिज्यिक बैंक।
- सहकारी समितियाँ।
बैंक (Banks)
बैंक निम्नलिखित कार्यों के लिए ऋण प्रदान करते हैं—
- कृषि।
- व्यवसाय।
- शिक्षा।
- आवास।
- व्यक्तिगत आवश्यकताएँ तथा अन्य उद्देश्य।
सहकारी समितियाँ (Cooperative Societies)
सहकारी समितियाँ अपने सदस्यों को ऋण उपलब्ध करा सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो सकती है।
भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका (Role of RBI)
भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India — RBI) भारत में बैंकों का नियमन और पर्यवेक्षण करता है।
भारतीय रिजर्व बैंक—
- बैंकों के कामकाज की निगरानी करता है।
- नियामक आवश्यकताएँ निर्धारित करता है।
- बैंकों को निर्धारित नियमों का पालन करने के लिए बाध्य करता है।
- बैंकिंग व्यवस्था में स्थिरता और विश्वास बनाए रखने के लिए कार्य करता है।
औपचारिक स्रोत क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
औपचारिक स्रोतों से मिलने वाले ऋण की शर्तें सामान्यतः अधिक पारदर्शी होती हैं और वे नियामक निगरानी के अधीन होते हैं।
उदाहरण
एक छोटा व्यवसायी बैंक से निर्धारित ब्याज दर पर व्यावसायिक ऋण ले सकता है और उसे तय की गई किस्तों में चुका सकता है।
9. साख के अनौपचारिक स्रोत (Informal Sources of Credit)
अनौपचारिक स्रोत वे ऋणदाता या ऋण व्यवस्थाएँ हैं, जो सामान्यतः औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था के बाहर काम करती हैं।
इनके प्रमुख उदाहरण हैं—
- साहूकार।
- व्यापारी।
- नियोक्ता।
- रिश्तेदार।
- मित्र।
साहूकार (Moneylenders)
साहूकार जल्दी ऋण दे सकते हैं और कभी-कभी बहुत कम दस्तावेज माँगते हैं।
हालाँकि, उनकी ब्याज दरें और अन्य शर्तें अलग-अलग हो सकती हैं तथा कुछ मामलों में बहुत अधिक भी हो सकती हैं।
व्यापारी (Traders)
कोई व्यापारी किसान को ऋण दे सकता है और बाद में किसान की उपज खरीद सकता है।
नियोक्ता (Employers)
कोई नियोक्ता अपने कर्मचारी को अग्रिम धन दे सकता है, जिसकी राशि बाद में उसके वेतन से काटी जा सकती है।
रिश्तेदार और मित्र (Relatives and Friends)
लोग परिवार के सदस्यों या मित्रों से भी धन उधार ले सकते हैं। ऐसे ऋणों में अक्सर औपचारिक प्रक्रियाएँ कम होती हैं।
अनौपचारिक साख की समस्याएँ
अनौपचारिक ऋणों में कभी-कभी निम्नलिखित समस्याएँ हो सकती हैं—
- ऊँची ब्याज दरें।
- अस्पष्ट शर्तें।
- शोषण की संभावना।
- ऋण चुकाने में कठिनाइयाँ।
उदाहरण
एक किसान को चिकित्सा उपचार के लिए तुरंत धन की आवश्यकता है। वह दूसरे विकल्पों की तुलना किए बिना साहूकार से ऋण ले लेता है। यदि ब्याज दर बहुत अधिक है, तो उसके लिए ऋण चुकाना कठिन हो सकता है।
10. औपचारिक और अनौपचारिक साख के स्रोतों में अंतर (Formal vs Informal Sources of Credit)
| अंतर का आधार | औपचारिक स्रोत | अनौपचारिक स्रोत |
| उदाहरण | बैंक, सहकारी समितियाँ | साहूकार, व्यापारी, रिश्तेदार |
| नियमन | मान्यता प्राप्त नियामक व्यवस्था के अधीन | सामान्यतः बैंकों जैसी नियामक व्यवस्था के अधीन नहीं |
| ब्याज दर | सामान्यतः अधिक पारदर्शी | अलग-अलग हो सकती है और बहुत अधिक भी हो सकती है |
| दस्तावेज | सामान्यतः आवश्यक | सीमित या लचीले हो सकते हैं |
| लिखित समझौता | सामान्यतः होता है | हो भी सकता है और नहीं भी |
| ऋण लेने वाले की सुरक्षा | अपेक्षाकृत अधिक | कुछ मामलों में कम |
| पारदर्शिता | सामान्यतः अधिक | कम भी हो सकती है |
| शोषण का जोखिम | सामान्यतः कम | कुछ परिस्थितियों में अधिक |
औपचारिक साख का विस्तार क्यों आवश्यक है?
आज भी अनेक गरीब परिवार अनौपचारिक ऋणदाताओं पर निर्भर हैं, क्योंकि उनके लिए औपचारिक ऋण प्राप्त करना हमेशा आसान नहीं होता।
सस्ती और सुलभ औपचारिक साख का विस्तार निम्नलिखित कार्यों में सहायता कर सकता है—
- साहूकारों पर निर्भरता कम करना।
- ऋण लेने की लागत कम करना।
- उत्पादक गतिविधियों को बढ़ावा देना।
- वित्तीय सुरक्षा में सुधार करना।
- आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना।
उदाहरण
यदि किसी किसान को बहुत अधिक ब्याज पर साहूकार से ऋण लेने के बजाय उचित शर्तों पर बैंक से ऋण मिल जाए, तो उसके लिए ऋण चुकाना आसान हो सकता है और फसल से होने वाली आय का अधिक हिस्सा उसके पास बच सकता है।
11. ग्रामीण क्षेत्रों में साख और ऋण-जाल (Credit in Rural Areas and Debt Trap)
ग्रामीण क्षेत्रों में साख का विशेष महत्त्व है, क्योंकि किसानों और ग्रामीण श्रमिकों को अक्सर आय प्राप्त होने से पहले ही धन की आवश्यकता होती है।
किसानों को ऋण की आवश्यकता क्यों होती है?
किसानों को निम्नलिखित कार्यों के लिए ऋण की आवश्यकता हो सकती है—
- बीज खरीदना।
- उर्वरक खरीदना।
- कीटनाशक खरीदना।
- सिंचाई की व्यवस्था करना।
- कृषि मशीनें खरीदना।
- पशुधन खरीदना।
- कृषि श्रमिकों को मजदूरी देना।
फसल खराब होने की समस्या
कृषि उत्पादन कई कारकों से प्रभावित हो सकता है, जैसे—
- सूखा।
- अत्यधिक वर्षा।
- कीटों का प्रकोप।
- फसलों में बीमारियाँ।
- फसल की कीमतों में गिरावट।
यदि फसल खराब हो जाती है, तो किसान को ऋण चुकाने के लिए पर्याप्त आय नहीं मिल पाती।
ऋण-जाल (Debt Trap)
ऋण-जाल ऐसी स्थिति है, जिसमें ऋण लेने वाला व्यक्ति ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाता है और अपनी पुरानी देनदारियों को पूरा करने के लिए उसे फिर से ऋण लेना पड़ सकता है।
उदाहरण
मान लीजिए, एक किसान कपास की खेती करने के लिए ₹60,000 का ऋण लेता है। अचानक फसल खराब होने के कारण उसकी आय केवल ₹30,000 होती है।
अब वह पूरा ऋण चुकाने में असमर्थ हो सकता है। बकाया राशि चुकाने के लिए उसे एक और ऋण लेना पड़ सकता है।
इस प्रकार, वह लगातार बढ़ते कर्ज के चक्र में फँस सकता है।
महत्त्वपूर्ण बिंदु
साख अपने आप में हानिकारक नहीं होती। इसका परिणाम मुख्य रूप से निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है—
ऋण लेने का उद्देश्य + ऋण की लागत + उससे होने वाली आय + ऋण चुकाने की क्षमता
12. स्वयं सहायता समूह (SHGs) और सस्ती साख (Self-Help Groups and Affordable Credit)
स्वयं सहायता समूह का अर्थ (Meaning of Self-Help Groups)
स्वयं सहायता समूह (Self-Help Group — SHG) ऐसे लोगों का एक छोटा समूह होता है, जिनकी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ प्रायः समान होती हैं। ये लोग नियमित रूप से बचत करते हैं और समूह के सदस्यों को छोटे ऋण उपलब्ध कराते हैं।
गरीब परिवारों और महिलाओं के लिए ऋण तक पहुँच बढ़ाने में स्वयं सहायता समूहों की विशेष भूमिका होती है।
स्वयं सहायता समूह कैसे काम करता है?
समूह के सदस्य—
- एक समूह बनाते हैं।
- नियमित रूप से थोड़ी-थोड़ी बचत करते हैं।
- एक साझा कोष बनाते हैं।
- समूह के सदस्यों को छोटे ऋण देते हैं।
- सहमत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराते हैं।
- बचत और ऋण का रिकॉर्ड रखते हैं।
- बाद में समूह के रूप में बैंक से ऋण भी प्राप्त कर सकते हैं।
स्वयं सहायता समूहों के लाभ
स्वयं सहायता समूह—
- छोटे ऋण प्राप्त करने में सहायता करते हैं।
- साहूकारों पर निर्भरता कम कर सकते हैं।
- नियमित बचत को प्रोत्साहित करते हैं।
- छोटे व्यवसायों को बढ़ावा देते हैं।
- आपातकालीन परिस्थितियों में सहायता करते हैं।
- वित्तीय निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाते हैं।
- महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को मजबूत करते हैं।
उदाहरण
मान लीजिए, 15 महिलाएँ मिलकर एक स्वयं सहायता समूह बनाती हैं। प्रत्येक महिला हर महीने ₹100 की बचत करती है।
समूह की कुल मासिक बचत होगी—
\[ 15 \times ₹100 = ₹1,500 \]
इस प्रकार, समूह में हर महीने ₹1,500 जमा होंगे।
समय के साथ संचित बचत का उपयोग समूह के सदस्यों को छोटे ऋण देने के लिए किया जा सकता है। इन ऋणों से सदस्य कच्चा माल खरीद सकती हैं, पशुधन खरीद सकती हैं या छोटा व्यवसाय शुरू कर सकती हैं।
स्वयं सहायता समूह और महिला सशक्तीकरण (SHGs and Women Empowerment)
स्वयं सहायता समूह महिलाओं को निम्नलिखित क्षेत्रों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने में मदद कर सकते हैं—
- वित्तीय निर्णय लेना।
- आय अर्जित करने वाली गतिविधियों में भाग लेना।
- परिवार से संबंधित आर्थिक निर्णय लेना।
- छोटे व्यवसाय चलाना।
- सामुदायिक गतिविधियों में भाग लेना।
इस प्रकार, स्वयं सहायता समूह न केवल वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देते हैं, बल्कि महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण में भी योगदान देते हैं।
अध्याय का त्वरित पुनरावर्तन (Quick Chapter Revision)
| क्रमांक | विषय | मुख्य विचार |
| 1 | विनिमय के माध्यम के रूप में मुद्रा | मुद्रा वस्तु-विनिमय प्रणाली की समस्याओं को दूर करती है। |
| 2 | मुद्रा के आधुनिक रूप | करेंसी और बैंक जमा मुद्रा के आधुनिक रूप हैं। |
| 3 | करेंसी और बैंक जमा | बैंक जमा का उपयोग भुगतान करने के लिए किया जा सकता है। |
| 4 | मांग जमा और चेक | मांग जमा को आवश्यकता पड़ने पर निकाला जा सकता है और इसका उपयोग लेन-देन में किया जा सकता है। |
| 5 | बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ | बैंक जमा स्वीकार करते हैं और ऋण प्रदान करते हैं। |
| 6 | साख और उसका महत्त्व | साख उत्पादन और आय बढ़ाने में सहायता कर सकती है। |
| 7 | साख की शर्तें | ब्याज दर, जमानत, दस्तावेज, पुनर्भुगतान और ऋण की अवधि महत्त्वपूर्ण हैं। |
| 8 | औपचारिक साख के स्रोत | बैंक और सहकारी समितियाँ औपचारिक साख प्रदान करते हैं। |
| 9 | अनौपचारिक साख के स्रोत | साहूकार, व्यापारी, नियोक्ता, रिश्तेदार और मित्र इसके प्रमुख स्रोत हैं। |
| 10 | औपचारिक और अनौपचारिक साख में अंतर | औपचारिक साख सामान्यतः अधिक पारदर्शी और नियामक निगरानी के अधीन होती है। |
| 11 | ग्रामीण साख और ऋण-जाल | फसल खराब होने और महँगे ऋण के कारण पुनर्भुगतान की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। |
| 12 | स्वयं सहायता समूह | बचत-आधारित समूह छोटे ऋणों तक पहुँच बढ़ाने में सहायता करते हैं। |
निष्कर्ष: मुद्रा आधुनिक अर्थव्यवस्था में विनिमय को सरल बनाती है, जबकि साख लोगों को अपनी आर्थिक आवश्यकताएँ पूरी करने और उत्पादन बढ़ाने में सहायता करती है। हालाँकि, ऋण की लागत, उसकी शर्तों और पुनर्भुगतान की क्षमता पर ध्यान देना आवश्यक है, ताकि व्यक्ति ऋण-जाल में फँसने से बच सके।
