अध्याय: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sectors of the Indian Economy)

परिचय (Introduction)

जब हम अपने आसपास देखते हैं, तो हमें लोग अनेक प्रकार के कार्य करते हुए दिखाई देते हैं। कुछ लोग खेतों में फसलें उगाते हैं, कुछ कारखानों में काम करते हैं, कुछ दुकानें चलाते हैं, कुछ बस चलाते हैं, कुछ विद्यालयों में पढ़ाते हैं, जबकि अन्य लोग बैंकों, अस्पतालों और कार्यालयों में काम करते हैं।

ये सभी गतिविधियाँ अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। इन गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझने के लिए अर्थशास्त्री आर्थिक गतिविधियों को अलग-अलग क्षेत्रकों में बाँटते हैं।

आर्थिक गतिविधियों का वर्गीकरण मुख्यतः तीन आधारों पर किया जाता है:

  1. प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक — आर्थिक गतिविधियों की प्रकृति के आधार पर।
  2. संगठित और असंगठित क्षेत्रक — रोजगार की परिस्थितियों और कार्य-नियमों के आधार पर।
  3. सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक — स्वामित्व के आधार पर।

आइए, सरल उदाहरणों की सहायता से इन सभी को समझते हैं।

1. प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector)

प्राथमिक क्षेत्रक में वे आर्थिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं जो सीधे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करती हैं।

सरल शब्दों में, इस क्षेत्रक में लोग प्रकृति से सीधे वस्तुएँ प्राप्त करते हैं या प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके उनका उत्पादन करते हैं।

उदाहरण

  • कृषि (Agriculture)
  • मत्स्य पालन (Fishing)
  • वानिकी (Forestry)
  • पशुपालन (Animal Husbandry)
  • डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming)
  • खनन (Mining)

सरल उदाहरण

कल्पना कीजिए कि एक किसान अपने खेत में गेहूँ उगाता है।

गेहूँ उगाने के लिए किसान भूमि, पानी, बीज और सूर्य के प्रकाश का उपयोग करता है। चूँकि गेहूँ का उत्पादन प्राकृतिक संसाधनों की सहायता से होता है, इसलिए कृषि प्राथमिक क्षेत्रक की गतिविधि है।

इसी प्रकार, नदी या समुद्र से मछलियाँ पकड़ने वाला मछुआरा भी प्राथमिक क्षेत्रक में काम करता है।

याद रखें:

प्राथमिक क्षेत्रक = प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों से सीधे जुड़ी आर्थिक गतिविधियाँ।

2. द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector)

द्वितीयक क्षेत्रक में वे आर्थिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं जिनमें कच्चे माल को बदलकर दूसरी उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती हैं।

यह क्षेत्रक मुख्य रूप से विनिर्माण (Manufacturing) और निर्माण (Construction) से संबंधित है।

उदाहरण के लिए, किसान कपास का उत्पादन करते हैं। एक कपड़ा कारखाना इसी कपास का उपयोग करके धागा और कपड़ा बनाता है।

इस प्रकार:

कपास → धागा → कपड़ा

कपास का उत्पादन प्राथमिक क्षेत्रक में आता है, जबकि कपास से धागा और कपड़ा बनाना द्वितीयक क्षेत्रक की गतिविधियाँ हैं।

अन्य उदाहरण

  • गन्ना → चीनी
  • गेहूँ → आटा
  • लौह अयस्क → इस्पात
  • लकड़ी → फर्नीचर
  • दूध → पैकेट में बंद दुग्ध उत्पाद

निर्माण कार्य भी द्वितीयक क्षेत्रक में शामिल होता है।

उदाहरण:

  • मकान बनाना
  • सड़क का निर्माण करना
  • पुल बनाना
  • कारखाने का निर्माण करना

याद रखें:

द्वितीयक क्षेत्रक = कच्चे माल को उपयोगी वस्तुओं में बदलने वाली गतिविधियाँ।

3. तृतीयक क्षेत्रक (Tertiary Sector)

तृतीयक क्षेत्रक को सेवा क्षेत्रक (Service Sector) भी कहा जाता है।

प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रकों के विपरीत, यह क्षेत्रक मुख्य रूप से भौतिक वस्तुओं का उत्पादन नहीं करता, बल्कि ऐसी सेवाएँ प्रदान करता है जो लोगों तथा अन्य व्यवसायों के काम आती हैं।

उदाहरण

  • शिक्षक शिक्षा प्रदान करते हैं।
  • डॉक्टर स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करते हैं।
  • बैंक वित्तीय सेवाएँ प्रदान करते हैं।
  • चालक परिवहन सेवाएँ प्रदान करते हैं।
  • दुकानदार व्यापार संबंधी सेवाएँ प्रदान करते हैं।
  • संचार कंपनियाँ संचार सेवाएँ प्रदान करती हैं।
  • होटल आवास और आतिथ्य सेवाएँ प्रदान करते हैं।

सरल उदाहरण

मान लीजिए कि एक किसान गेहूँ का उत्पादन करता है।

इस गेहूँ को आटा मिल तक पहुँचाने के लिए परिवहन की आवश्यकता होती है। एक ट्रक चालक गेहूँ को मिल तक पहुँचाता है।

चालक न तो गेहूँ का उत्पादन करता है और न ही आटा बनाता है। वह परिवहन सेवा प्रदान करता है।

इसलिए परिवहन तृतीयक क्षेत्रक की गतिविधि है।

याद रखें:

तृतीयक क्षेत्रक = सेवाएँ प्रदान करने वाली आर्थिक गतिविधियाँ।

4. तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं?

अर्थव्यवस्था को तीन क्षेत्रकों में बाँटने के बावजूद ये एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करते। इनके बीच घनिष्ठ संबंध होता है।

आइए, एक कमीज का उदाहरण लेते हैं।

पहला चरण: प्राथमिक क्षेत्रक

एक किसान कपास उगाता है।

प्राथमिक क्षेत्रक → कपास का उत्पादन

दूसरा चरण: द्वितीयक क्षेत्रक

एक कारखाना कपास से कपड़ा बनाता है और फिर कमीज तैयार करता है।

द्वितीयक क्षेत्रक → कमीज का निर्माण

तीसरा चरण: तृतीयक क्षेत्रक

परिवहनकर्ता कमीज को दुकानों तक पहुँचाते हैं, बैंक वित्तीय सेवाएँ प्रदान करते हैं और खुदरा व्यापारी कमीज बेचते हैं।

तृतीयक क्षेत्रक → परिवहन, बैंकिंग और व्यापार

इस प्रकार, एक साधारण कमीज के उत्पादन और बिक्री में तीनों क्षेत्रकों का योगदान होता है।

यह दर्शाता है कि तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इस संबंध को परस्पर निर्भरता (Interdependence) कहते हैं।

5. अंतिम वस्तुएँ और सेवाएँ (Final Goods and Services)

जब अर्थशास्त्री किसी देश के कुल उत्पादन की गणना करते हैं, तो उन्हें इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि एक ही वस्तु के मूल्य की गणना एक से अधिक बार न हो।

इसी कारण सामान्यतः अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य की गणना की जाती है।

अंतिम वस्तु वह वस्तु है जो अंतिम उपयोग के लिए तैयार होती है और जिसका उपयोग किसी दूसरी वस्तु के उत्पादन में इनपुट के रूप में नहीं किया जाना है।

उदाहरण

एक परिवार दुकान से ब्रेड खरीदता है और उसे खा लेता है।

यह ब्रेड एक अंतिम वस्तु है, क्योंकि इसका उपयोग उपभोक्ता अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिए कर रहा है।

6. मध्यवर्ती वस्तुएँ (Intermediate Goods)

मध्यवर्ती वस्तु वह वस्तु है जिसका उपयोग किसी दूसरी वस्तु के उत्पादन में किया जाता है।

उदाहरण के लिए, एक बेकरी ब्रेड बनाने के लिए आटा खरीदती है।

बेकरी के लिए आटा एक मध्यवर्ती वस्तु है, क्योंकि उसका उपयोग दूसरी वस्तु यानी ब्रेड बनाने में किया जाएगा।

इसी प्रकार, आटा मिल द्वारा खरीदा गया गेहूँ उस मिल के लिए मध्यवर्ती वस्तु है।

सरल उदाहरण

गेहूँ → आटा → ब्रेड

यहाँ:

  • गेहूँ, आटा मिल के लिए मध्यवर्ती इनपुट हो सकता है।
  • आटा, बेकरी के लिए मध्यवर्ती इनपुट है।
  • उपभोक्ता द्वारा खरीदी गई ब्रेड अंतिम वस्तु है।

ध्यान दें कि किसी वस्तु का अंतिम या मध्यवर्ती होना इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है।

7. दोहरी गणना से क्यों बचना चाहिए? (Double Counting)

मान लीजिए कि एक किसान ₹20 में गेहूँ बेचता है।

आटा मिल गेहूँ को पीसकर आटा बनाती है और उसे ₹30 में बेचती है।

बेकरी उस आटे से ब्रेड बनाती है और उसे ₹50 में बेचती है।

यदि हम इन तीनों मूल्यों को सीधे जोड़ दें, तो:

₹20 + ₹30 + ₹50 = ₹100

लेकिन इस प्रकार गेहूँ के मूल्य को उत्पादन के विभिन्न चरणों में एक से अधिक बार गिना जाता है।

इसे दोहरी गणना (Double Counting) कहते हैं।

इस समस्या से बचने के लिए अर्थशास्त्री अंतिम वस्तुओं के मूल्य की गणना करते हैं या उत्पादन के प्रत्येक चरण में जोड़े गए मूल्य की गणना करते हैं।

मूल्य संवर्धन (Value Addition) का अर्थ है उत्पादन के किसी चरण में वस्तु के मूल्य में होने वाली वृद्धि।

8. GDP — सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product)

GDP का पूरा नाम Gross Domestic Product है। हिंदी में इसे सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है।

GDP से आशय किसी देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर एक निश्चित अवधि, सामान्यतः एक वर्ष, में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य से है।

उदाहरण के लिए, देश के भीतर उत्पादित निम्नलिखित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य GDP में योगदान करते हैं:

  • खाद्य उत्पाद
  • कारें
  • कपड़े
  • मोबाइल फोन
  • बैंकिंग सेवाएँ
  • शिक्षा सेवाएँ
  • स्वास्थ्य सेवाएँ

यहाँ ध्यान रखना आवश्यक है कि GDP की गणना में केवल वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन नहीं, बल्कि अंतिम उत्पादन के मूल्य को उचित तरीके से गिना जाता है, ताकि दोहरी गणना न हो।

GDP क्यों महत्त्वपूर्ण है?

GDP हमें समझने में सहायता करता है कि:

  1. अर्थव्यवस्था में कितना उत्पादन हो रहा है।
  2. आर्थिक गतिविधियों का आकार कितना है।
  3. विभिन्न क्षेत्रक अर्थव्यवस्था में कितना योगदान दे रहे हैं।

9. विभिन्न क्षेत्रकों का बदलता महत्त्व

जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था का विकास होता है, वैसे-वैसे विभिन्न क्षेत्रकों का महत्त्व भी बदलता है।

विकास के शुरुआती चरणों में बड़ी संख्या में लोग कृषि तथा अन्य प्राथमिक गतिविधियों पर निर्भर हो सकते हैं।

जैसे-जैसे उद्योगों का विकास होता है, द्वितीयक क्षेत्रक का महत्त्व बढ़ सकता है।

आर्थिक विकास के आगे के चरणों में शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, परिवहन और संचार जैसी सेवाओं की माँग सामान्यतः बढ़ती है। परिणामस्वरूप, तृतीयक क्षेत्रक अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा बन सकता है।

हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कृषि का महत्त्व समाप्त हो जाता है।

कृषि आज भी खाद्यान्न, कच्चा माल और रोजगार प्रदान करती है तथा उद्योगों और सेवाओं से घनिष्ठ रूप से जुड़ी रहती है।

10. तृतीयक क्षेत्रक का विकास क्यों हो रहा है?

सेवा क्षेत्रक का महत्त्व कई कारणों से बढ़ रहा है।

(क) बुनियादी सेवाओं की बढ़ती आवश्यकता

जनसंख्या बढ़ने के साथ लोगों को अधिक सेवाओं की आवश्यकता होती है, जैसे:

  • विद्यालय
  • अस्पताल
  • परिवहन
  • बैंक
  • संचार
  • सार्वजनिक सेवाएँ

इन आवश्यकताओं के कारण तृतीयक क्षेत्रक में रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।

(ख) कृषि और उद्योगों का विकास

कृषि और उद्योगों को कुशलतापूर्वक चलाने के लिए विभिन्न सेवाओं की आवश्यकता होती है।

किसानों को चाहिए:

  • बैंकिंग सेवाएँ
  • परिवहन
  • भंडारण
  • बीमा
  • बाजार

कारखानों को चाहिए:

  • परिवहन
  • बैंकिंग
  • संचार
  • गोदाम
  • विपणन

इसलिए प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रकों के विकास से भी सेवाओं की माँग बढ़ती है।

(ग) आय में वृद्धि

जब लोगों की आय बढ़ती है, तो वे प्रायः निम्नलिखित सेवाओं पर अधिक खर्च करने लगते हैं:

  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • पर्यटन
  • रेस्तराँ
  • मनोरंजन
  • परिवहन

(घ) नई तकनीक

तकनीकी विकास ने कई नई सेवाओं को जन्म दिया है।

उदाहरण:

  • ऑनलाइन बैंकिंग
  • डिजिटल भुगतान
  • ई-कॉमर्स
  • ऑनलाइन शिक्षा
  • सॉफ्टवेयर सेवाएँ
  • ऐप आधारित परिवहन
  • डिजिटल संचार

इन सेवाओं ने तृतीयक क्षेत्रक की गतिविधियों और रोजगार के अवसरों को बढ़ाने में योगदान दिया है।

11. विभिन्न क्षेत्रकों में रोजगार

लोग तीनों क्षेत्रकों में काम करके अपनी आजीविका कमाते हैं।

प्राथमिक क्षेत्रक के उदाहरण

  • किसान
  • कृषि मजदूर
  • मछुआरे
  • डेयरी कर्मचारी

द्वितीयक क्षेत्रक के उदाहरण

  • कारखानों में काम करने वाले श्रमिक
  • मशीन संचालक
  • निर्माण श्रमिक
  • इंजीनियर

तृतीयक क्षेत्रक के उदाहरण

  • शिक्षक
  • डॉक्टर
  • बैंक कर्मचारी
  • चालक
  • दुकानदार
  • सूचना प्रौद्योगिकी (IT) के पेशेवर

12. प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment)

यह इस अध्याय की एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा है।

प्रच्छन्न बेरोजगारी उस स्थिति को कहते हैं जिसमें किसी आर्थिक गतिविधि में आवश्यकता से अधिक लोग काम कर रहे होते हैं।

यह स्थिति कृषि क्षेत्र में अक्सर देखने को मिलती है।

उदाहरण

मान लीजिए कि एक छोटे खेत पर तीन मजदूरों की सहायता से पूरा काम ठीक से किया जा सकता है।

लेकिन उस खेत पर परिवार के छह सदस्य काम कर रहे हैं।

यदि उनमें से तीन सदस्य काम करना बंद कर दें और कुल उत्पादन लगभग पहले जितना ही बना रहे, तो इसका अर्थ है कि उत्पादन के मौजूदा स्तर के लिए उन तीन सदस्यों की आवश्यकता नहीं थी।

ऐसे अतिरिक्त श्रमिक प्रच्छन्न रूप से बेरोजगार माने जाते हैं।

सरल शब्दों में:

जब किसी काम में आवश्यकता से अधिक लोग लगे हों और कुछ लोगों के हटने पर भी उत्पादन में कोई उल्लेखनीय कमी न आए, तो इसे प्रच्छन्न बेरोजगारी कहते हैं।

13. अल्परोजगार (Underemployment)

अल्परोजगार का अर्थ है ऐसी स्थिति जिसमें किसी व्यक्ति के पास काम तो होता है, लेकिन उसकी श्रम-क्षमता या कौशल का पूरा उपयोग नहीं हो पाता।

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति पूर्णकालिक काम करने की इच्छा और क्षमता रखता है, लेकिन उसे केवल कुछ घंटों का काम मिलता है।

इसी प्रकार, कोई कुशल व्यक्ति ऐसी नौकरी कर सकता है जिसमें उसके कौशल का पूरा उपयोग नहीं होता।

बेरोजगारी और अल्परोजगार में अंतर

  • बेरोजगारी: व्यक्ति के पास काम नहीं है, जबकि वह काम करने के लिए इच्छुक और उपलब्ध है।
  • अल्परोजगार: व्यक्ति के पास कुछ काम है, लेकिन उसके श्रम, समय या कौशल का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है।

14. संगठित क्षेत्रक (Organised Sector)

संगठित क्षेत्रक में वे कार्यस्थल शामिल होते हैं जहाँ रोजगार की परिस्थितियाँ सरकारी नियमों और लागू कानूनों के अनुसार विनियमित होती हैं।

इस क्षेत्रक में काम करने वाले कर्मचारियों की रोजगार संबंधी शर्तें सामान्यतः अधिक स्पष्ट होती हैं।

प्रमुख विशेषताएँ

रोजगार की प्रकृति के अनुसार, कर्मचारियों को निम्नलिखित सुविधाएँ मिल सकती हैं:

  • नियमित रोजगार
  • निश्चित कार्य-समय
  • नियमित वेतन या मजदूरी
  • सवेतन अवकाश
  • नौकरी से संबंधित लाभ
  • रोजगार संबंधी अधिक सुरक्षा
  • लागू सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के अंतर्गत लाभ

उदाहरण

  • सरकारी कार्यालय
  • पंजीकृत कारखाने
  • बैंक
  • बड़ी कंपनियाँ
  • अनेक औपचारिक संस्थान

सरल उदाहरण

कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति एक पंजीकृत कंपनी में लिखित रोजगार समझौते के अंतर्गत काम करता है। उसके कार्य-समय और अवकाश के नियम निर्धारित हैं।

यह संगठित क्षेत्रक में रोजगार का उदाहरण है।

ध्यान दें कि केवल बड़ी कंपनी में काम करना ही पर्याप्त नहीं है; रोजगार की वास्तविक परिस्थितियाँ और लागू नियम भी महत्त्वपूर्ण होते हैं।

15. असंगठित क्षेत्रक (Unorganised Sector)

असंगठित क्षेत्रक में मुख्यतः ऐसे छोटे और अनौपचारिक कार्यस्थल शामिल होते हैं जहाँ रोजगार की परिस्थितियाँ उचित रूप से विनियमित नहीं हो सकती हैं।

उदाहरण

  • सड़क किनारे सामान बेचने वाले विक्रेता
  • छोटी दुकानें
  • घरेलू कामगार
  • आकस्मिक मजदूर
  • छोटी कार्यशालाएँ
  • अनेक छोटे सेवा व्यवसाय

इस क्षेत्रक के श्रमिकों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है:

  • कम मजदूरी
  • अनियमित रोजगार
  • लंबे कार्य-घंटे
  • सवेतन अवकाश का अभाव
  • नौकरी की असुरक्षा
  • सामाजिक सुरक्षा संबंधी सीमित लाभ

उदाहरण

एक दिहाड़ी मजदूर को किसी दिन काम मिल सकता है, लेकिन अगले दिन काम नहीं भी मिल सकता है।

जिस दिन उसे काम नहीं मिलता, उस दिन उसकी आय भी नहीं हो सकती।

इससे उसका रोजगार असुरक्षित हो जाता है।

16. असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों को संरक्षण की आवश्यकता क्यों है?

असंगठित क्षेत्रक के अनेक श्रमिकों की सौदेबाजी करने की क्षमता सीमित होती है।

इस कारण उनके लिए उचित मजदूरी, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियों, नियमित रोजगार और सामाजिक सुरक्षा संबंधी लाभों की माँग करना कठिन हो सकता है।

इसलिए कमजोर श्रमिकों की सुरक्षा के लिए सरकारी नीतियाँ और श्रम-संबंधी कानूनी संरक्षण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

17. सार्वजनिक क्षेत्रक (Public Sector)

सार्वजनिक क्षेत्रक में वे संगठन और आर्थिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं जिनका स्वामित्व या नियंत्रण सरकार के पास होता है।

उदाहरण

  • सरकारी विद्यालय
  • सरकारी अस्पताल
  • सार्वजनिक प्रशासन
  • नगर निगम की सेवाएँ
  • सार्वजनिक आधारभूत संरचना

सार्वजनिक क्षेत्रक का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराना और जनकल्याण को बढ़ावा देना होता है।

उदाहरण

एक सरकारी अस्पताल उन लोगों को भी स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान कर सकता है जो महँगे निजी उपचार का खर्च नहीं उठा सकते।

18. निजी क्षेत्रक (Private Sector)

निजी क्षेत्रक में वे व्यवसाय शामिल होते हैं जिनका स्वामित्व और संचालन व्यक्तियों या निजी कंपनियों द्वारा किया जाता है।

उदाहरण

  • निजी विद्यालय
  • निजी अस्पताल
  • निजी कारखाने
  • निजी बैंक
  • दुकानें
  • सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियाँ

निजी व्यवसाय सामान्यतः वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति करते हुए लाभ कमाने के उद्देश्य से काम करते हैं।

हालाँकि, किसी निजी संगठन का उद्देश्य केवल लाभ कमाना ही नहीं, बल्कि अन्य व्यावसायिक या सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करना भी हो सकता है।

19. सार्वजनिक क्षेत्रक और निजी क्षेत्रक में अंतर

अंतर का आधारसार्वजनिक क्षेत्रकनिजी क्षेत्रक
स्वामित्वसरकार के पास या उसके नियंत्रण मेंव्यक्तियों या निजी कंपनियों के पास
प्रमुख उद्देश्यजनकल्याण एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्यलाभ कमाना सामान्यतः एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य
निर्णयसरकारी प्राधिकरणों या संबंधित प्रबंधन द्वारामालिकों या प्रबंधन द्वारा
उदाहरणसरकारी अस्पतालनिजी अस्पताल

20. सरकार कुछ सेवाएँ क्यों उपलब्ध कराती है?

हर आवश्यक सेवा को पूरी तरह निजी व्यवसायों पर नहीं छोड़ा जा सकता।

निजी कंपनियाँ सामान्यतः इस बात पर विचार करती हैं कि किसी गतिविधि से पर्याप्त आय या लाभ प्राप्त होगा या नहीं।

लेकिन कुछ सेवाएँ सभी लोगों के कल्याण के लिए आवश्यक होती हैं, भले ही उनसे पर्याप्त लाभ प्राप्त न हो।

उदाहरण

  • सड़कें
  • सार्वजनिक स्वच्छता
  • पेयजल
  • बुनियादी शिक्षा
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ
  • सार्वजनिक आधारभूत संरचना

सरल उदाहरण

मान लीजिए कि एक दूरस्थ गाँव में सड़क की आवश्यकता है।

वहाँ की जनसंख्या कम होने के कारण किसी निजी कंपनी को सड़क बनाने में पर्याप्त लाभ दिखाई नहीं देता।

फिर भी सरकार सड़क का निर्माण कर सकती है, क्योंकि वह सड़क ग्रामीणों के आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

21. सार्वजनिक सुविधाएँ (Public Facilities)

सार्वजनिक सुविधाएँ वे सेवाएँ और सुविधाएँ हैं जो लोगों के लाभ और कल्याण के लिए उपलब्ध कराई जाती हैं।

उदाहरण

  • सड़कें
  • सार्वजनिक परिवहन
  • पेयजल
  • स्वच्छता
  • सरकारी विद्यालय
  • सरकारी अस्पताल
  • सार्वजनिक आधारभूत संरचना

ये सुविधाएँ लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करती हैं और आर्थिक विकास को भी सहायता प्रदान करती हैं।

22. रोजगार के अधिक अवसरों का सृजन

भारत को अधिक उत्पादक रोजगार अवसरों की आवश्यकता है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए।

इसे प्राप्त करने का एक तरीका आधारभूत संरचना में सुधार करना और अधिक आर्थिक गतिविधियों का विकास करना है।

कृषि क्षेत्र में

रोजगार बढ़ाने के लिए निम्नलिखित कदम उपयोगी हो सकते हैं:

  • सिंचाई सुविधाओं का विकास
  • बेहतर भंडारण
  • शीत भंडारण (Cold Storage)
  • खाद्य प्रसंस्करण
  • बेहतर परिवहन
  • बहुफसली खेती

ग्रामीण क्षेत्रों में

अधिक रोजगार के अवसर निम्नलिखित गतिविधियों से उत्पन्न हो सकते हैं:

  • डेयरी फार्मिंग
  • खाद्य प्रसंस्करण
  • लघु उद्योग
  • हस्तशिल्प
  • ग्रामीण पर्यटन

सेवा क्षेत्र में

रोजगार निम्नलिखित क्षेत्रों में बढ़ सकता है:

  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • बैंकिंग
  • परिवहन
  • पर्यटन
  • संचार

उदाहरण

मान लीजिए कि किसी गाँव में बेहतर सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।

अब किसान एक वर्ष में एक से अधिक फसलें उगा सकते हैं। इससे कृषि कार्य के अधिक अवसर पैदा हो सकते हैं और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ सकती है।

23. मनरेगा (MGNREGA)

MGNREGA का पूरा नाम Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act है। हिंदी में इसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कहा जाता है।

यह ग्रामीण रोजगार से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था।

इसका उद्देश्य अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार पात्र ग्रामीण परिवारों को मजदूरी आधारित रोजगार की गारंटी प्रदान करना था।

इस कार्यक्रम के अंतर्गत अनुमत सार्वजनिक कार्यों के माध्यम से उपयोगी ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माण भी किया जाता था।

कार्य के उदाहरण

स्वीकृत स्थानीय परियोजनाओं के आधार पर कार्यों में शामिल हो सकते थे:

  • जल संरक्षण
  • भूमि विकास
  • ग्रामीण आधारभूत संरचना
  • अन्य अनुमत सार्वजनिक कार्य

यह क्यों महत्त्वपूर्ण था?

यह कार्यक्रम निम्नलिखित उद्देश्यों में सहायता करता था:

  • मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराना
  • ग्रामीण परिवारों को आर्थिक सहायता देना
  • मौसमी कृषि कार्य पर निर्भरता कम करना
  • उपयोगी सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण करना
  • ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना

24. तीनों क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता

तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।

आइए, एक किसान का उदाहरण लेते हैं।

किसान को खेती के लिए निम्नलिखित चीजों और सेवाओं की आवश्यकता हो सकती है:

  • बीज
  • उर्वरक
  • कृषि उपकरण
  • बैंक ऋण
  • बीमा
  • परिवहन
  • भंडारण
  • बाजार संबंधी सेवाएँ

इनमें से कुछ वस्तुएँ द्वितीयक क्षेत्रक से प्राप्त होती हैं, जबकि अनेक सेवाएँ तृतीयक क्षेत्रक द्वारा प्रदान की जाती हैं।

इस प्रकार किसान अन्य क्षेत्रकों की सहायता के बिना अपनी सभी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता।

यह तीनों क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता को दर्शाता है।

25. एक संपूर्ण उदाहरण: खेत से उपभोक्ता तक

आइए, ब्रेड की यात्रा को समझते हैं।

चरण 1: प्राथमिक क्षेत्रक

एक किसान गेहूँ उगाता है।

किसान → गेहूँ

चरण 2: द्वितीयक क्षेत्रक

एक आटा मिल गेहूँ को पीसकर आटा बनाती है।

गेहूँ → आटा

इसके बाद एक बेकरी आटे से ब्रेड बनाती है।

आटा → ब्रेड

चरण 3: तृतीयक क्षेत्रक

अब विभिन्न सेवाएँ इसमें शामिल होती हैं।

  • बैंक वित्तीय सेवाएँ प्रदान करता है।
  • परिवहन कंपनी वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाती है।
  • थोक व्यापारी ब्रेड का वितरण करता है।
  • खुदरा विक्रेता ब्रेड बेचता है।
  • डिजिटल भुगतान सेवाएँ खरीदारी में सहायता करती हैं।

अंत में, उपभोक्ता ब्रेड खरीदता है।

यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि एक सामान्य वस्तु के उत्पादन और वितरण में तीनों क्षेत्रक किस प्रकार जुड़े होते हैं।

26. तीनों प्रकार के वर्गीकरणों में भ्रम न करें

यह इस अध्याय की सबसे महत्त्वपूर्ण बातों में से एक है।

वर्गीकरण 1: आर्थिक गतिविधि की प्रकृति के आधार पर

प्राथमिक — द्वितीयक — तृतीयक

यह बताता है कि किस प्रकार की आर्थिक गतिविधि की जा रही है।

वर्गीकरण 2: रोजगार की परिस्थितियों के आधार पर

संगठित — असंगठित

यह बताता है कि रोजगार की परिस्थितियाँ कैसी हैं और कार्य-नियम किस प्रकार लागू होते हैं।

वर्गीकरण 3: स्वामित्व के आधार पर

सार्वजनिक — निजी

यह बताता है कि किसी संगठन का स्वामित्व या नियंत्रण किसके पास है।

उदाहरण

एक सरकारी अस्पताल को तीनों आधारों पर इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • तृतीयक क्षेत्रक: क्योंकि यह स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करता है।
  • संगठित क्षेत्रक: यदि वहाँ रोजगार लागू नियमों और विनियमों के अंतर्गत व्यवस्थित है।
  • सार्वजनिक क्षेत्रक: क्योंकि उसका स्वामित्व या नियंत्रण सरकार के पास है।

इस प्रकार, एक ही संगठन को अलग-अलग आधारों पर एक से अधिक श्रेणियों में रखा जा सकता है।

27. VB–G RAM G क्या है?

VB–G RAM G ग्रामीण रोजगार और विकास से संबंधित एक वैधानिक ढाँचा है। दिए गए विवरण के अनुसार, इसके अंतर्गत प्रत्येक पात्र ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 125 दिनों के मजदूरी-आधारित रोजगार की वैधानिक गारंटी प्रदान की जाती है, बशर्ते परिवार के वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक हों और अधिनियम की अन्य शर्तें पूरी करते हों।

पहले की MGNREGA व्यवस्था में 100 दिनों के रोजगार की गारंटी थी। नए ढाँचे में यह वैधानिक रोजगार गारंटी बढ़ाकर 125 दिन की गई है।

मुख्य उद्देश्य

इस कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  1. ग्रामीण परिवारों को मजदूरी आधारित रोजगार प्रदान करना।
  2. ग्रामीण आजीविका की सुरक्षा को मजबूत करना।
  3. टिकाऊ और उत्पादक ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माण करना।
  4. ग्रामीण आधारभूत संरचना में सुधार करना।
  5. जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन को बढ़ावा देना।
  6. गाँवों के विकास को मजबूत करना।
  7. टिकाऊ आजीविका के अवसरों को प्रोत्साहित करना।
  8. विकसित भारत @2047 के व्यापक दृष्टिकोण में योगदान देना।

रोजगार की गारंटी कैसे काम करती है?

पात्र ग्रामीण परिवार संबंधित स्थानीय अधिकारियों, जिनमें ग्राम पंचायत भी शामिल है, के माध्यम से रोजगार की माँग कर सकता है।

दिए गए सरकारी FAQ के विवरण के अनुसार, आवेदन के 15 दिनों के भीतर रोजगार उपलब्ध कराया जाना है।

यदि निर्धारित अवधि में रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जाता है, तो संबंधित श्रमिक अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार बेरोजगारी भत्ते का पात्र हो सकता है।

किस प्रकार के कार्य किए जाते हैं?

इस कार्यक्रम में ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोगी और टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण पर विशेष बल दिया जाता है।

प्रमुख कार्य-क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

  • जल संरक्षण
  • प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन
  • कृषि और उससे संबंधित गतिविधियाँ
  • ग्रामीण आधारभूत संरचना
  • भूमि विकास
  • अन्य अनुमत सार्वजनिक कार्य

इसका उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि ऐसी परिसंपत्तियों का निर्माण करना भी है जो गाँवों की उत्पादन क्षमता और विकास में सुधार कर सकें।

एक सरल उदाहरण

कल्पना कीजिए कि किसी गाँव में कई श्रमिकों को कुछ महीनों में पर्याप्त कृषि कार्य नहीं मिलता।

इसी समय गाँव में जल संरक्षण की बेहतर सुविधाओं की आवश्यकता है।

VB–G RAM G के अंतर्गत पात्र श्रमिक स्वीकृत ग्रामीण विकास कार्यों में मजदूरी आधारित रोजगार प्राप्त कर सकते हैं।

इसके परिणामस्वरूप:

श्रमिकों को रोजगार और मजदूरी मिलती है।

↓

गाँव में उपयोगी आधारभूत संरचना का निर्माण होता है।

↓

गाँव की उत्पादन क्षमता और विकास की संभावनाओं में सुधार हो सकता है।

इस प्रकार रोजगार सृजन को ग्रामीण विकास से जोड़ा जाता है।

मजदूरी का भुगतान

दिए गए विवरण के अनुसार, सरकार ने मजदूरी सीधे श्रमिकों के बैंक या डाकघर खातों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer — DBT) के माध्यम से भेजने की व्यवस्था बताई है।

इस ढाँचे में समय पर मजदूरी भुगतान का प्रावधान है। मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या मस्टर रोल बंद होने के बाद निर्धारित अवधि के भीतर किया जाना है, जो अधिनियम के प्रावधानों के अधीन है।

MGNREGA के मौजूदा श्रमिकों के साथ क्या हुआ?

संक्रमण की प्रक्रिया को निरंतर बनाए रखने की व्यवस्था की गई थी।

मौजूदा ई-KYC सत्यापित MGNREGA जॉब कार्डों को नए ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड जारी होने तक वैध रहने की अनुमति दी गई थी।

MGNREGA के अंतर्गत चल रहे कार्यों को भी नए ढाँचे में स्थानांतरित करने की व्यवस्था की गई थी, ताकि रोजगार और विकास कार्य अचानक बंद न हों।

MGNREGA और VB–G RAM G में अंतर

अंतर का आधारMGNREGAVB–G RAM G
पूरा नाममहात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियमविकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)
अधिनियम का वर्ष20052025
स्थितिपहले का ढाँचा; दिए गए विवरण के अनुसार 1 जुलाई 2026 से निरस्तदिए गए विवरण के अनुसार 1 जुलाई 2026 से लागू नया ढाँचा
रोजगार की गारंटीअधिकतम 100 दिनअधिकतम 125 दिन
मुख्य उद्देश्यग्रामीण मजदूरी आधारित रोजगार और ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माणग्रामीण रोजगार, आजीविका सुरक्षा और उत्पादक एवं टिकाऊ ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माण
कार्यों का प्रकारस्वीकृत ग्रामीण कार्यों के अंतर्गत मुख्यतः अकुशल शारीरिक श्रमस्वीकृत ग्रामीण विकास कार्यों के अंतर्गत अकुशल शारीरिक श्रम
ग्राम पंचायत की भूमिकायोजना निर्माण और कार्यान्वयन में महत्त्वपूर्ण भूमिकाग्राम पंचायत आधारित योजना निर्माण और कार्यान्वयन पर अधिक बल
विकास का दृष्टिकोणरोजगार सृजन और ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माणरोजगार, आजीविका सुरक्षा और एकीकृत ग्रामीण विकास
2026–27 के संदर्भ में प्रासंगिकतापूर्ववर्ती कार्यक्रमदिए गए विवरण के अनुसार वर्तमान कार्यक्रम

महत्त्वपूर्ण तथ्य-जाँच संबंधी नोट: ऊपर VB–G RAM G के नाम, अधिनियम की स्थिति, लागू होने की तारीख, रोजगार के दिनों और संक्रमण संबंधी प्रावधानों को आपके दिए गए अंग्रेज़ी पाठ के अनुसार हिंदी में प्रस्तुत किया गया है। इन्हें विद्यार्थियों के लिए 2026–27 की अध्ययन सामग्री में अंतिम रूप से प्रकाशित करने से पहले संबंधित आधिकारिक अधिनियम, राजपत्र अधिसूचना और ग्रामीण विकास मंत्रालय के नवीनतम दस्तावेजों से सत्यापित कर लेना उचित होगा।